रांची: 
2 अक्टूबर भारत के इतिहास में दो महान विभूति— राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री—की जयंती का दिन है। झारखंड के लिए यह तारीख केवल राष्ट्रीय स्मृति का अवसर नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की उन कहानियों को याद करने का दिन भी है, जिनमें गांधी, टाना भगत और छोटानागपुर की धरती का गहरा संबंध रहा है।
महात्मा गांधी का झारखंड से संबंध 1917 से दिखाई देता है, जब चंपारण आंदोलन से जुड़े घटनाक्रम के दौरान रांची में उनकी तत्कालीन बिहार-उड़ीसा के लेफ्टिनेंट गवर्नर सर एडवर्ड गेट से मुलाकात हुई थी। 1925 में गांधी फिर झारखंड आए। 17 सितंबर को रांची में उन्होंने चरखा और खादी को बढ़ावा देने की अपील की। महिलाओं की एक सभा में उन्होंने देशबंधु स्मारक कोष के लिए सहयोग मांगा, जिसके जवाब में कई महिलाओं ने अपने आभूषण तक दान कर दिए।

गांधी से प्रेरित हुए टाना भगत

गांधी के झारखंड दौरे की सबसे खास कहानियों में से एक टाना भगत आंदोलन है। 1914 में जतरा उरांव के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन शुरुआत में सामाजिक और कृषि संबंधी समस्याओं से जुड़ा था। बाद में टाना भगत गांधी के अहिंसा, स्वदेशी और असहयोग के विचारों से प्रभावित हुए। वे खादी पहनते, चरखा चलाते और कांग्रेस के झंडे के साथ लंबी दूरी तय कर सभाओं में पहुंचते थे। रांची जिला प्रशासन के इतिहास विवरण के अनुसार, बड़ी संख्या में टाना भगत 1922 के गया कांग्रेस अधिवेशन में शामिल हुए थे। 
महात्मा गांधी ने भी टाना भगतों की प्रतिबद्धता की काफी सराहना की । 1925 में उन्होंने करीब 400 टाना भगतों को चरखा चलाते देखा और उनके खादी तथा चरखे के प्रति समर्पण का उल्लेख किया। बाद में टाना भगत गांधी को सम्मान से “गांधी महाराज” या “गांधी बाबा” कहने लगे। 1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन में भी टाना भगतों की मौजूदगी दर्ज है और उन्होंने गांधी को 400 रुपये की थैली भेंट की थी।

रामगढ़ अधिवेशन में शामिल हुए

रामगढ़ गांधी की झारखंड यात्रा का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है। 1940 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन रामगढ़ में हुआ, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद अध्यक्ष थे और गांधी, जवाहरलाल नेहरू तथा सरदार पटेल सहित कई नेता पहुंचे थे। गांधी ने इस दौरान खादी, सामाजिक सुधार और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े मुद्दों पर जोर दिया। रामगढ़ में उनके भाषणों में खादी और ग्रामोद्योग को स्वतंत्रता संघर्ष का महत्वपूर्ण आधार बताया गया। 
इसी 2 अक्टूबर को लाल बहादुर शास्त्री की जयंती भी मनाई जाती है। शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को हुआ था और वे गांधी के विचारों से गहराई से प्रभावित थे। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक विवरण में उनके विचारों में गांधीवादी सादगी और सेवा की भावना का उल्लेख मिलता है। उनका प्रसिद्ध नारा “जय जवान, जय किसान” देश की सुरक्षा और कृषि दोनों के महत्व को सामने रखता है।

जमशेदपुर में है लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल कॉलेज

झारखंड में शास्त्री की विरासत का एक संस्थागत संबंध जमशेदपुर के करनडीह स्थित लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल कॉलेज से जुड़ता है। कॉलेज की स्थापना 1971 में हुई और इसकी आधारशिला शास्त्री जी की पत्नी ललिता शास्त्री ने रखी थी। संस्था आज भी शास्त्री के नाम और उनके शिक्षा, अनुशासन तथा सामाजिक जिम्मेदारी के आदर्शों से जुड़ी हुई है। 
इस तरह 2 अक्टूबर झारखंड के लिए दो अलग लेकिन जुड़े संदेश सामने रखता है—गांधी की अहिंसा, स्वदेशी और जनभागीदारी, तथा शास्त्री की सादगी, अनुशासन और किसान-जवान के प्रति सम्मान। और इनके बीच टाना भगतों की कहानी बताती है कि झारखंड की धरती ने स्वतंत्रता आंदोलन में केवल नेताओं को नहीं, बल्कि गांवों और आदिवासी समाज के आम लोगों को भी इतिहास का सक्रिय हिस्सा बनाया था।